सवाल 1: क्या आपके अनुसार “धर्म” इंसान को मुक्त करता है या बाँध देता है?
उत्तर: मैं मानता हूँ कि धर्म मनुष्य को बाँध लेता है। मुक्त मनुष्य, व्यभिचारी बनता, कामी, लोभी, पापी, मदिरापान करने वाला, अहंकारी, दुराचारी, क्योंकि वह मुक्त है उस पर बंधन नहीं है। वही धर्म से जुड़ा व्यक्ति जो सत्कर्मी मनुष्य है, बंध जाता है—सत्य से, ईश्वर से। ईश्वर ने स्वयं से हमें अलग किया, माँ से जोड़ दिया; माँ से अलग किया तो पत्नी से जोड़ दिया, पत्नी से अलग किया तो संतान से जोड़ दिया, और संतान से अलग किया तो खुद से जोड़ लिया। मुक्त व्यक्ति स्वयं को अंधकार में ले जाता है। यदि आप किसी रस्सी से बंधे हैं और आपको पता है सामने गहरी खाई है, आप उस रस्सी को काटकर स्वयं को और खाई में गिराते हैं, आपका क्या हश्र होगा बताइए? यही सत्य है—विनाश, मुक्त मनुष्य अंधकार में जाता है, बंधन से बंधा व्यक्ति ईश्वर में लीन हो जाता है। लेकिन एक शर्त है, जिस भी बंधन से बंधे, याद रहे कि वह बंधन अगले बंधन तक ही रहना चाहिए, अन्यथा बंधनों के जाल में जीवन कैद हो जाता है। राय को थामना उचित है, किन्तु रस्सी में खुद को लपेट कर रखना कैद है।
सवाल 2: मनुष्य कैसे पहचाने कि वह “साधन” के बंधन में है या “कैद” के बंधन में? धर्म और अंध-आसक्ति के बीच की रेखा कहाँ खींची जाए?
उत्तर:यदि मनुष्य मुक्ति की कामना करता है, तो वह किस कारण से करता है? जाहिर सी बात है, उसे ईश्वर को प्राप्त करना है। आत्मा परमात्मा में मिलना चाहती है। परंतु एक नौजवान व्यक्ति, जो माँ-बाप, भाई-बहन और प्रेमिका या प्रेमी से बनी आत्मा है, कैसे जान पाएगी कि वह बंधी है या मुक्त है? ऐसे में मनुष्य को गुरु की तलाश करनी चाहिए। आज के समय में जो मैथ, साइंस या इंग्लिश पढ़ाने वाले गुरु बन गए हैं, यही समस्या है। प्राचीन काल में गुरु का कार्य मनुष्य को ईश्वर से मिलाना ही हुआ करता था। उन्हें वेद, राजनीति और अर्थशास्त्र, ज्योतिष, आयुर्वेद सभी की शिक्षा भी मनुष्य को देनी होती थी, लेकिन जो परम सत्य था, वह तो ईश्वर ही था। आत्मा को परमात्मा में मिलाना ही एक गुरु का कार्य था। ऐसे में मनुष्य किस बंधन में बंधा है और वह कैद है, यह सभी केवल गुरु के माध्यम से ही पता चलता है। कोई गुरु आज नहीं मिलता, सभी आधुनिक जमाने के शिक्षक बन गए हैं। ऐसे में मेरा मत है कि ईश्वर ही एक मात्र बंधन है, जिसमें मनुष्य को स्वयं को बाँधकर रखना चाहिए। बाकी सभी बंधन—रिश्ते, नाते, संतान, संबंधी—वे सभी कैद के समान हैं।
सवाल 3: क्या ईश्वर किसी विशेष स्थान में सीमित है या मनुष्य के भीतर भी उतनी ही तीव्रता से उपस्थित है?
उत्तर: देखिए, ईश्वर मनुष्य के भीतर नहीं है, यह भ्रांति है। मनुष्य ही ईश्वर है, यह सत्य है।
सवाल 4: यदि मनुष्य ही ईश्वर है, तो अज्ञान, पाप, लोभ, हिंसा और अधर्म कहाँ से आते हैं?
उत्तर: पाप क्या है, पुण्य क्या है, ये सभी भ्रम हैं। उदाहरण स्वरूप, आप खाना पैदा करते हैं खेत में, उसे खाते हैं और पचाते हैं। मल त्याग के पश्चात उसी खेत में खाद स्वरूप वह मिट्टी में उर्वरक बनकर पैदावार देता है। ऐसे ही मनुष्य भी मरण और जन्म लेता है और पुनः जीवन-मरण के चक्र में उलझा रहता है। लेकिन मैंने यह कहा कि मनुष्य ही ईश्वर है, ऐसे में यह भी ज्ञात रहे कि यह पृथ्वी मृत्यु लोक है, और यहाँ सभी का जन्म-मरण निश्चित है। और मनुष्य इसी कारण अपनी ईश्वरता भूल जाता है। यदि वह यह ज्ञात कर ले तो वह अहंकारी बनकर राक्षस बनकर अन्य मनुष्य को समाप्त करने की चेष्टा करेगा। आसान भाषा में कहूं तो ईश्वर धरती पर अपने स्वरूप के साथ नहीं आते, वे साधारण स्वरूप में आते हैं। बाकी सभी मनुष्य हम आत्माएं सिर्फ़ फुटप्रिंट हैं, या कहें कि हम बॉट्स हैं, ईश्वर के बनाए जो सिर्फ़ टेस्टिंग फेज में कार्य कर रहे हैं। जब ईश्वर स्वयं आते हैं, तब वे सृष्टि को पुनः वायरस-बॉट्स से मुक्त कर सॉफ़्टवेयर अपडेट कर देते हैं। कहने का अर्थ है—मनुष्य ही ईश्वर है, किन्तु अभी उतना ज्ञान नहीं है और यही सब माया है।
सवाल 5: व्यक्तिगत या सामाजिक स्तर पर हम अपनी ईश्वरता को कैसे पहचान सकते हैं, ताकि अहंकार और विनाश से बच सकें?
उत्तर: देखिए, मनुष्य चाहे कोई हो, या कोई जानवर या पक्षी, वह सामने वाले को देखकर सीखता है। आप कुछ खाएँ तो आप सभी को बताएंगे—यह अच्छा फल था या खराब। ऐसे ही जब सृष्टि की रचना ईश्वर द्वारा हुई, तो यह बताना कि सही हुआ या नहीं, यह कार्य करने हेतु कुछ लोगों को कार्य सौंपा गया। ईश्वर ने खुद से कुछ लोगों को या आत्माओं को उत्पन्न किया। वे आत्माएं, शक्तिशाली, श्रेष्ठ, कहें तो ईश्वर के समान हैं। जो आत्माएं अच्छी जगह पर पहुँचीं, उन्हें सभी सुख प्राप्त हुए, वे देव आत्मा कहलायीं। जो दूसरी तरफ बुरी रचनाओं को महसूस करती रही, वे असुर कहलायीं। उनमें ईश्वर तक शक्ति थी, किन्तु उनमें ईश्वर होने का गुण नहीं था। वे सभी अच्छे-बुरे के जाल में फँस गईं। जिनका कार्य ईश्वर को यह बताना था कि "हे प्रभु, आपने जिस सृष्टि का निर्माण किया है, उसमें कुछ रखने योग्य है और कुछ को विलुप्त कर देना चाहिए", उन्हें यह बताने के बजाय वे उसके भोग में लग गए। अच्छे सुख महसूस करने वाले देवता उस सुख का आनंद लेते रहे, वहीं बुरी रचना के संपर्क में आए असुर अच्छे की कामना से विद्रोह करते रहे। इसी तरह ईश्वर ने अपने कार्य न करने वाले सुरों और असुरों को सजा के स्वरूप बुरी रचना में जीने के लिए भेजा। और यही से स्वर्ग और पाताल लोक की स्थापना हुई। जब कुछ लोग यह कहने लगे कि "हे ईश्वर, हम निर्दोष हैं और हमने कुछ नहीं किया", ऐसे में ईश्वर ने मृत्यु लोक बनाया, जहाँ स्वयं को निर्दोष बताने वाले जन्म लेकर यह साबित करें कि वे निर्दोष हैं। यदि उनका आचरण सही होता, तो वह व्यक्ति, वह आत्मा सत्य के मार्ग पर ही चलती।
सवाल 6: क्या मनुष्य स्वयं अपने कर्मों से बदल सकता है?
उत्तर: सबसे पहले, जैसे लाई डिटेक्टर टेस्ट होता है यह जानने के लिए कि सामने वाला व्यक्ति झूठ बोल रहा है या सत्य। जब इंसान यह जान सके और उसके पश्चात सजा का प्रबंध है, ऐसे में ईश्वर ने मनुष्य के आचरण में ही लाई डिटेक्टर को जोड़ दिया। जन्म के पश्चात ही मनुष्य अपने पुनर्जन्म वाले कर्म दोहराता है। वही आदत अपनाता है जो उसके पिछले जन्म में थी। कहने को यह कि यहाँ वह असुर था या सुर। पृथ्वी मृत्यु लोक में उसका लाई डिटेक्टर टेस्ट हो रहा है कर्मों से, वह अपने पुराने पिछले जन्म के कर्मों को दोहराता है। ईश्वर उसे मौका भी देते हैं—सौ वर्ष की आयु में नहीं सुधर गया, लेकिन आदत के वश में व्यक्ति अपने कर्मों से साबित करता रहता है कि वह पिछले जन्म का दोषी था या निर्दोष, और अंत में वह नरक या स्वर्ग के रथ खोल देता है।
सवाल 7: क्या गुरु की उपस्थिति आवश्यक है?
उत्तर: यदि ईश्वर ने मनुष्य को यहाँ लाई डिटेक्टर टेस्ट के लिए भेजा है, उन आत्माओं को ईश्वर ने सही रास्ता दिखाने के लिए गुरु स्वरूप भी भेजा है, जो बताते हैं क्या करना है, क्या नहीं। गुरु को न मानकर दुराचारी आत्मा नरक में सजा का पात्र बनती है।
सवाल 8: क्या सत्यकर्मी आत्मा अपने जन्म में पूर्व कर्म साबित करती है?
उत्तर: आत्मा केवल यहाँ साबित करने आई है कि वह जब देवता या असुर थी तब भी सत्कर्मी थी। यदि उसका आचरण वैसा नहीं होगा मृत्यु लोक में, तो वह ईश्वर से झूठ बोलने के दोष में नरक में जाएगी।
सवाल 9: गुरु का पालन और सत्यकर्म का महत्व
उत्तर: पुनः मैं कहना चाहूँगा—गुरु स्वरूप ईश्वर सभी आत्माओं को पुनः ईश्वर में मिलने के लिए प्रेरित करके आत्मा को परमात्मा से मिलाने का कार्य करता है। और गुरु को न मानकर दुराचारी आत्मा नरक में सजा का पात्र बनती है।
सवाल 10: सत्कर्मी आत्मा को ईश्वर स्वयं पुरस्कार क्यों देते हैं?
उत्तर: मनुष्य स्वयं ईश्वर है, किन्तु देव और असुर की भांति आचरण से वह मनुष्य बना। जो सही है या गलत, उनके कर्म निर्धारित करते हैं। और सत्कर्मी को ईश्वर गुरु के रूप में पुरस्कार देते हैं
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